खुदा का खुदाई पर हर्सू अमल है,
तफ़क्कुर मे फिर क्यू जान अपनी हॆ खोता
जो कुछ हुआ आकबर समझ ठीक उसीको;
ज़रूरी न होता तो हर्गिस न होता!
-अकबर इल्हाबादी
इन्तज़ार हो भी गई खतम, हुम भी बोले, भरी शोर मे, हये बदे ज़ोर से. वोह रूठे सबसे, वोह सब है रूठे |
जब एहसाँसों का सिल्सिला तोद दिया, हाये बदे ज़ोर से. वोह है सब बोले, वोह सब है बोले |
झब लब्सों को हम है तोके, हये गौर से, बदे ज़ोर से. वोह बोले सब है, वोह सब है बोले |
-में
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इक साँस- that one breath
Nothing at all कुछ भी तो नहीं …
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